लॉक-इन अवधि — समझें आसान भाषा में

कभी सोचा है कि कुछ निवेशों को आप तुरंत पैसा निकालकर बेच नहीं पाते? यह नियम लॉक-इन अवधि कहलाता है। आसान शब्दों में, यह वो समय होता है जब निवेशक को अपनी राशि बेचने, निकासी करने या ट्रांसफर करने की अनुमति नहीं होती।

लॉक-इन अवधि क्या-क्या होती है और उदाहरण

हर निवेश का लॉक-इन अलग होता है। कुछ सामान्य उदाहरण:

  • ELSS (इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम): 3 साल का लॉक-इन। टैक्स बचत के साथ यह सबसे छोटी लॉक-इन वाली टैक्स बचत स्कीम है।
  • PPF: मूल रूप से 15 साल का लॉक-इन, पर नियमों के तहत कुछ शर्तों पर आंशिक निकासी संभव होती है।
  • IPO और प्रमोटरों के शेयर: सार्वजनिक निर्गम में प्रमोटर्स और बड़े निवेशकों के लिए 6 महीने से लेकर 3 साल तक का लॉक-इन हो सकता है।
  • ESOP और वेस्टिंग: कर्मचारी स्टॉक ऑप्शन्स में वेस्टिंग और उसके बाद कभी-कभी लॉक-इन होता है; इसका मतलब है कि शेयर मिलने के बाद भी तुरंत बेच नहीं पाएंगे।
  • नॉन-रिडीमेबल फ़ाइनेंशियल प्रॉडक्ट्स: कुछ बांड, फिक्स्ड डिपॉज़िट्स या क्रिस्टलाइज्ड प्रोडक्ट्स में भी लॉक-इन शर्तें रहती हैं।

हर प्रोडक्ट का प्रॉस्पेक्टस, ऑफर डॉक्यूमेंट या स्कीम डॉक्यूमेंट लॉक-इन नियम साफ बताता है।

क्यों जरूरी है और आपको क्या ध्यान रखना चाहिए

लॉक-इन कई कारणों से होता है: नियामकीय सुरक्षा, टैक्स बेनिफिट की शर्तें, प्रमोटरों की प्रतिबद्धता या निवेश की स्थिरता। पर इसका मतलब ये भी है कि आप जल्दी नकदी नहीं पा पाएंगे। इसलिए प्लानिंग जरूरी है।

कई लोगों की गलती यह रहती है कि वे लॉक-इन वाले निवेश से आपातकालीन बचत नहीं बनाते। सही तरीका यह है कि आप अलग से 3–6 महीने की एक्सपेंस कवरेज कैश/लिक्विड फंड में रखें और लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए लॉक-इन उत्पाद लें।

टैक्स और लाभ पर भी असर पड़ता है। उदाहरण के लिए, ELSS में लॉक-इन पूरी होने पर भी कैपिटल गेन नियम लागू होंगे। ESOP में टैक्सेशन अलग तरह से होता है (एक्सरसाइज़ और सेल पर अलग-अलग असर)। इसलिए निवेश से पहले टैक्स नियम पढ़ें या सलाह लें।

अगर आपको अचानक पैसा चाहिए तो क्या करें? कुछ विकल्प होते हैं: वैकल्पिक लिक्विड फंड, ओवरड्राफ्ट, या आपातकालीन क्रेडिट लाइन। लॉक-इन वाले ही निवेश को तोड़ने पर पेनल्टी या नियमों के कारण नुकसान हो सकता है।

आम टिप्स:

  • हर निवेश का डॉक्यूमेंट ध्यान से पढ़ें—लॉक-इन की अवधि और शर्तें अलग हो सकती हैं।
  • लिक्विडिटी की जरूरत पहले तय करें; फिर लॉक-इन वाला प्लान चुनें।
  • कर और नियमों के बदलाव के लिए साल में एक बार चेक करें।
  • ESOP या IPO जैसी कॉर्पोरेट चीजों में कंपनी HR या वित्त से लिखित नियम मांगें।

लॉक-इन अवधि जरूरी है पर समझकर लिया जाए तो यह आपकी निवेश योजना का फायदेमंद हिस्सा बन सकती है। अगर किसी विशेष निवेश का लॉक-इन और टैक्स असर जानना हो तो उस प्रोडक्ट का दस्तावेज़ या फाइनेंसियल एडवाइज़र से सलाह लें।

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